खास चर्चा: मोबाइल दिमाग के लिए खतरा या वरदान?

जयपुर। “मोबाइल दिमाग के लिए खतरा है या वरदान?”—इसी अहम विषय पर खास चर्चा में हमारे साथ रहे डॉ. लवेश सैनी, MBBS, MD (Psychiatry), MD (Community Medicine), MPH (UK), PGDAE, PGDCFT (Gold Medalist)। उन्होंने कहा कि मोबाइल अपने आप में न तो पूरी तरह दुश्मन है, न ही पूरी तरह मित्र—उसका असर इस बात पर निर्भर करता है कि हम उसका इस्तेमाल कैसे करते हैं।

युवाओं में बढ़ता रुझान: चिंता की वजह?

डॉ. सैनी के अनुसार, लगातार स्क्रीन टाइम, खासकर देर रात तक मोबाइल उपयोग, नींद की कमी, चिड़चिड़ापन, एकाग्रता में गिरावट, एंग्जायटी और डिप्रेशन जैसी समस्याएं बढ़ा सकता है। सोशल मीडिया पर तुलना की प्रवृत्ति से आत्मसम्मान पर भी असर पड़ता है।

परिवार में दूरी कितनी हकीकत?

उन्होंने कहा कि “डिजिटल साथ, लेकिन भावनात्मक दूरी” आज की बड़ी चुनौती है। एक ही घर में रहते हुए भी लोग अलग-अलग स्क्रीन में व्यस्त रहते हैं, जिससे संवाद कम होता है और रिश्तों में दूरी बढ़ सकती है।

बच्चों पर असर

पढ़ाई में ध्यान भटकना

आउटडोर गतिविधियों में कमी

व्यवहार में बदलाव और गुस्सा

नींद का बिगड़ना

 

बड़ों पर असर

काम की उत्पादकता में गिरावट

सोशल मीडिया निर्भरता

तनाव और FOMO (कुछ छूट जाने का डर)

 

क्या है बचाव?

डॉ. सैनी ने कुछ व्यावहारिक सुझाव दिए—

1. स्क्रीन टाइम लिमिट तय करें (खासकर बच्चों के लिए)।

 

2. नो-फोन जोन बनाएं—जैसे डाइनिंग टेबल और बेडरूम।

 

3. डिजिटल डिटॉक्स डे—हफ्ते में एक दिन सीमित उपयोग।

 

4. बच्चों के लिए पेरेंटल कंट्रोल और कंटेंट मॉनिटरिंग।

 

5. परिवार में रोज कम से कम 30–45 मिनट आमने-सामने बातचीत।

 

6. जरूरत पड़े तो मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लें।

 

निष्कर्ष

मोबाइल ज्ञान, कनेक्टिविटी और अवसर देता है, लेकिन अति उपयोग मानसिक और पारिवारिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है। संतुलित और जिम्मेदार उपयोग ही इसका सही समाधान है।

Related Articles